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उदयजी ने जिस सत्य का साक्षात्कार किया और उससे यह निष्कर्ष निकाला कि अछूत की समस्या का समाधान अछूत जातियों की सांस्कृतिक उन्नति में निहित है। इसकी शुरुआत उन्होंने उनको पाठशाला के करीब लाकर और दारू के अड्डों से दूर ले जाकर की। वे यही चाहते थे कि दलित जातियाँ इतिहास से भी अपने सवालों के जवाब ढूँढ़े कि १० जनों के लिए २०० बीघा जमीन और ५६० जनों के लिए ९ कट्ठा ही क्यों? यह ९ कट्ठा भी चकबैरिया के मुसहरों को विरासत में नहीं मिली। इसके लिए लंबी लड़ाई लड़ी गई। छोटे दायरे में लड़ी गई ये लड़ाइयाँ इतिहास में दर्ज होने लायक नहीं हैं, क्योंकि यह किसी राजारानी के द्वारा नहीं लड़ी गइऔ। एक दलित यह लड़ाई अपने तरह के मुसहर जातियों के लिए वासभूमि दिलाने, राशन कार्ड और नागरिकता दिलाने के बाद सुअर के बाड़ों से निकालकर उन्हें स्कूल भेजने के लिए लड़ता रहा। मध्यकाल में अनेक सूबेदारों की उन लड़ाइयों को हम इतिहास के पाठयक्रम में पढ़ते हैं, जिसके मूल में कोई पराई महिला अथवा जागीरदारी रही है, उसे हम क्यों पढ़ते हैं, यह कभी नहीं बताया गया। लेकिन जो काम उदयजी ने अपने साथियों के साथ मिलकर किया, वह काम दलित जीवन के भी सबसे निचले पायदान पर खड़े महादलितों की विजय में, उनकी मुक्ति में मील का पत्थर बनेगा।.
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