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...अमृतसर के पास मजदूर बस्ती छहरता । मजदूर खुशी में घरों से निकले हैं कि लड़ाई बंद हो गई । साढ़े चार बजे लोग यह सुनना चाहते हैं कि अब क्या कह रहे हैं जनरल साहब । ठीक उसी समय एक सैबरजेट नीचे उड़ान भरते हुए झपटता आता है और सर्वनाश की तरह इस प्रकार घहरा उठता है कि बाजार ईंट-पत्थरों की ढेरी के रूप में परिवर्तित हो जाता है । आदमियों के स्थान पर मांस के लोथड़े और शरीर के टुकड़े दिखाई पड़ने लगे । टेलीफोन और बिजली के खंभों पर मांस के टुकड़े चिपके हुए मिले । उस समय इतिहास ने हाथ उठाकर ऐलान किया था. कुछ स्थितियाँ तो बहुत विचित्र लग रही थीं कि उस पाकिस्तानी बुनियादी जनतंत्र के नाम पर हजार-हजार पौंड के और साढ़े बारह- बारह मन के बम झोंके जा रहे थे; सो भी कहाँ-कहाँ? लहलहाती फसलों पर; आबादी पर; अस्पताल पर; घायल मरीजों पर; बीमार और कराहते औरतों और बच्चों पर; मंदिर- धर्मशालाओं पर; चर्च और गुरुद्वारों पर । भला वैसे पवित्रात्मा देशभक्त शहीद को भूत-प्रेत या जिन होना चाहिए? लेकिन नहीं; भीतर एक कामना एक वासना; एक उद्देश्य की आग दहक रही थी; जिसे लेकर वह जिन बन गया और पूर्ति के लिए सुयोग्य पात्र चुन लिया । सचमुच; भारत माता की खोज का उद्देश्य कितना महान् है! इस बेहाल-हाल में बेचारा जगदीश उस उद्देश्य को उसीकी भाषा में दुहरा रहा है । वे पैदल-पैदल साइकिल ढिमलाते धीरे- धीरे आगे बड़े । कुछ आगे जाकर फिर छवर के किनारे धूल पर भारत का नक्शा बना प्रतीत हुआ । इसमें कच्छ की खाड़ी और बिलोचिस्तानवाली लाइन सुरक्षित थी । शेष आने-जानेवाले पैदल आदमी के पैरों अथवा साइकिल आदि से खनकर हंडभंड हो गया था । बिलोचिस्तानवाली लाइन देखकर मास्टर साहब के होंठों पर मुसकान फूट गई । -इसी उपन्यास से
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