About Product
प्रसिद्ध बँगला उपन्यासकार श्रीमती आशापूर्णा देवी के इस उपन्यास की मुख्य पात्र है सुलेखा, जो एक मध्य वर्गीय परिवार में पली-बड़ी। बचपन में ही पिता को खोने से उसे तथा उसकी बीमार माँ को चाचा की गृहस्थी में शामिल होना पड़ा। बौद्धिक स्तर पर उन्नत होते हुए भी उसका मानसिक विकास न हो सका। उसके चरित्र पर गहरा प्रभाव पड़ा उसकी माँ का, जो अपनी आर्थिक व दैहिक असमर्थता के कारण एक अपराध-बोध से ग्रस्त थी। बचपन से ही सुलेखा को अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर दूसरों को सुखी रखने की साधना में लगना पड़ा। ऐसी स्थिति निरंतर बनी रही। विवाह के पश्चात् भी कोई फेर-बदल नहीं हुआ। फलत: उसका व्यक्तित्व हीन- भाव से दब गया; परंतु यह हीन-भाव उसकी कोमल प्रवृत्तियों को सुखा न सका। वह ममता का सागर बनकर अपने परिवार की हर खुशी के लिए अपने निजी सुख-स्वार्थ की आहुति देती रही। उसकी यह निस्लार्थ सेवा भी बहुलांश में समालोचना से घिरी रही। उसके जीवन भर की यही आकांक्षा और अभिलाषा रही कि उसके बच्चे जब बड़े हो जाएँगे तब वह मुक्त होकर स्वच्छंद गति से अपना जीवन जी पाएगी। मगर इस लक्ष्य की ओर बढ़ते-बढ़ते वह इतनी यांत्रिक हो गई कि जीवन से रस ग्रहण करना भूल गई। एक दिन जब लक्ष्य सामने आ गया तब उसे एहसास हुआ कि समाप्ति तक पहुँचना ही सही ढंग से जीना नहीं है, जीवन की मिठास तो उसे हर पल जीने में है। अत्यंत रोचक एवं पठनीय उपन्यास।
Tags:
Stories;