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भारतीय सामर्थ्य एवं चुनौतियाँ स्वतंत्रता के बाद के छह दशकों में भारत ने विकास एवं प्रगति के उल्लेखनीय आयाम तय किए हैं। देश ने विश्व को वैश्विक-आर्थिक नीति-निर्धारण में भी अपनी उपादेयता को आवश्यकता के रूप में स्वीकार करने पर विवश किया है। गौरव के इन सुखद क्षणों में तसवीर का एक दूसरा पहलू भी है, जो मन को बेचैन करता है। अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई, अत्यधिक उत्पादकता के लोभ में अंधाधुंध कीटनाशक एवं रासायनिक खादों के प्रयोग ने जहाँ भूमि की उर्वरा शक्ति को चौपट कर दिया है, वहीं फसलों की पौष्टिकता एवं पर्यावरण संतुलन को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है। कर्ज के दरिया में डूब आत्महत्या कर रहा किसान एवं भौतिकता की चकाचौंध में टूटता पारिवारिक ताना-बाना, वैश्वीकरण की मुक्त व्यापार की अवधारणा ने इन कस्बों एवं गाँवों में भी अपना व्यापक जाल फैला लिया है, जो कि कहीं-न-कहीं सामाजिक न्याय एवं आर्थिक निर्भरता के देखे गए सपनों के अधूरेपन को रेखांकित कर रहा है। विकास के संग अविकास की चुनौती के इस द्वंद्व को सर्वश्री दत्तोपंत ठेंगड़ी, गोविंदाचार्य, मुरलीधर राव तथा भरत झुनझुनवाला जैसे विचारक-मनीषियों ने अपने चिंतनपरक विचार प्रस्तुत किया है—‘भारतीय सामर्थ्य एवं चुनौतियाँ’ में।
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Indian History;
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