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यह तो वही है—सुधा “वह अभी तक बैठी ही हुई है?” थानेदार ने पूछा। “कौन, वह पगली?” “सुनो, वह पागल नहीं है।” थानेदार गंभीर होकर बोला। “बिलकुल सिरफिरी है। उसका दिमाग एकदम खिसका हुआ है।” “जानते हो, परसों से ही उसने कुछ खाया नहीं है।” “खाने को कुछ दे-दिलाकर भगाना चाहिए इस आफत को।” “वह भीख लेगी?” “देंगे, तो क्यों नहीं लेगी?” “कहती है कि बड़े बाप की बेटी है, ससुर भी नामी श्रेष्ठी था।” “तो यह क्यों मारी-मारी फिर रही है?” “अपने पति के बारे में पूछती फिर रही है।” “तो बता दीजिए उसे किकुछ कहकर टाल दीजिए।” “मैं कहूँ? क्यों? और तुम किस काम के लिए हो?” “सर, आपका कहना ही ठीक होगा।” “यह मेरा काम नहीं है।” “तो मुझमें भी इतनी हिंमत नहीं है कि उससे झूठ बोलूँ।” “एक औरत से झूठ नहीं बोल सकते? किस बूते पर सिपाही की नौकरी करने आए हो? उँहझूठ नहीं बोल सकते तो किसी आश्रम में चले जाओ!” थानेदार कुढ़कर बोला। —इसी पुस्तक से इससे बढ़कर दु:ख की बात क्या हो सकती है कि हजारों वर्षों से जड़ जमाकर बैठी अंधी और अपराध-मित्र न्याय-व्यवस्था अभी भी ज्यों-की-त्यों बनी हुई है। भारतीय सामाजिक एवं न्याय व्यवस्था पर करारी चोट करता हुआ प्रभावशाली उपन्यास यह तो वही है।
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