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अपने विशिष्ट गुणों के कारण बीरबल ने अकबर के नवरत्नों में अपना स्थान बनाया। आमतौर पर बीरबल को हँसोड़, चुटकुलेबाज और मजाकिया व्यक्ति के रूप में जाना जाता है। परंतु बीरबल मूलत: कवि थे और ‘ब्रह्म’ नाम से काव्य-रचना किया करते थे। उनमें विपुल सृजनात्मक प्रतिभा और क्षमता थी, जिसके चलते उन्होंने ‘गीता’ का फारसी भाषा में अनुवाद भी किया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि बीरबल को ‘राजा’ और ‘बीरबल’ की उपाधियाँ तो बाद में मिलीं, पर सबसे पहले अकबर जैसे सम्राट् ने उनको ‘कविराय’ की उपाधि से विभूषित किया। प्रस्तुत पुस्तक में राजा बीरबल के साहित्यिक स्वरूप व उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है। इससे सुधी पाठक राजा बीरबल के समग्र रूप का दिग्दर्शन कर अपना ज्ञानवर्धन कर सकेंगे।
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