About Product
बूढ़ा अपने अतीत में खोई हुई वर्तमान से कट गई थीं । न उनका अतीत वर्तमान में अँट रहा था और न वर्तमान उन्हें छू पा रहा था । उनके सामने जो यथार्थ था, उसे वे अपनी यातना का नरक समझ रही थीं । जो बीते हुए दिन थे, वे झिलमिल स्वप्न- लोक की तरह सिर्फ उन्हें भरमा रहे थे । उनके मन में न अतीत की सच्चाई थी और न वर्तमान की । दोनों उलट-पुलट गए थे । ' बूढ़ा ' शब्द तिरष्कार से लबालब भरा था । जो काम करने में असमर्थ हो, पराश्रित हो, धन रहते हुए भी उसके भोग की शक्ति न हो, किसी समाज में बैठने के लायक भी न हो, जिसे लड़के तक धकेलकर बाहर कर दें-वह है बूढ़ा । एक ओर पति की श्रद्धा की गंगा है, दूसरी ओर संतानों के स्नेह की यमुना । दो पाटों के बीच जिंदगी बालू हो गई है । उस पर जितना चल सकती हूँ चलूँगी । हार नहीं मानूँगी । बातो तिल-तिल जलकर बुझने के पहले धधा रही थी । रोशनी भी चटक थी और धुआँ भी तेज था । बुझते हुए दीये की रोशनी में वे घर-परिवार को असीसती थीं और धुएँ की कलौंछ में जलती- भुनती बातें कह जाती थीं । बुझते हुए दीये के कंपन में नीचे आशीर्वाद की रोशनी थी और ऊपर कटूक्तियों की कालिख थी । -इसी उपन्यास से
Tags:
Stories;