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‘फरारी’ सत्तर के दशक के आरंभ में तब लिखा गया, जब नक्सलवाद सत्ता (कांग्रेस) के खिलाफ सिर उठा रहा था और जैसे स्वतंत्रता आंदोलन में युवा वर्ग घर-कॉलेज त्याग कर गांधीजी के कदमों पर चल पड़ा था, वैसे ही विद्यापीठ और महाविद्यालयीन के छात्र मजदूरों व जनजातियों के हित के लिए, उनको हक दिलाने के लिए दृढनिष्ठा के साथ चारु मजुमदार जैसे साम्यवादी नेताओं के खेमों में भरती हो रहे थे। लेकिन नक्सली आंदोलन की नींव में हिंसा थी। अलबत्ता ‘फरारी’ का नायक नक्सली है। पर इस उपन्यास में राजनीति कम और रिश्तों का दर्द अधिक है। आशा है, प्रख्यात लेखक-कार्टूनिस्ट समाजधर्मी आबिद सुरती का ग्राफिक शैली में लिखा यह उपन्यास पाठकों को आकर्षित करेगा।.
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Novel;