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साहित्यिक परिवेश के व्यंग्य दूसरों का हाल तो हम जानते नहीं, लेकिन जहाँ तक हमारा सवाल है, साहित्यकार बनकर हम बहुत घाटे में रहे; यानी चक्कर में सदा दाल- आटे के रहे । हजारों-लाखों बार सोचा कि काश, हम साहित्यकार न हुए होते, किसी कार्यालय में अहलकार हो गए होते, किसी अधिकारी के पेशकार हो गए होते और यह भी संभव नहीं था तो किसी धनपति राजा- महाराजा के दरबार में चाटुकार ही हो गए होते । चाटुकारिता कुछ भी हो, लेकिन साहित्यकारिता की तुलना में कहीं अधिक लाभदायक होती है । अपि अपने विरुद्ध बनाए गए किसी मुकदमे के सिलसिले में अदालत जाइए । आप देखेंगे कि वहाँ पेशकार नाम के सज्जन पूर्णरूप से ध्यानमग्न हुए अपनी कुरसी पर विराजमान हैं । वादियों - प्रतिवादियों की भीड़ सामने खड़ी हुई है । हरेक व्यक्ति अपनी- अपनी कह रहा है, लेकिन वह किसी की भी नहीं सुनते हैं, अपने काम में व्यस्त हैं । वह जनवादी साहित्य नहीं, बल्कि कानूनवादी साहित्य रचने में जुटे हैं, और नजर उठाकर अपनी तरफ देखने को भी तैयार नहीं । जैसे-तैसे आप उनके निकट तक पहुँचते हैं और दस का नोट उनकी मुट्ठी में दबा देते हैं । तब वह झटपट कानूनवादी साहित्य रचकर फाइल आपकी ओर बढ़ा देते हैं कि दस्तखत करो । साहित्यिक गतिविधियों और साहित्यकारों की परिस्थितियों पर प्रस्तुत ये सार्थक व्यंग्य आपको गुदगुदाएँगे भई और अंदर तक प्रहार भी करेंगे ।
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