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चेतना के स्रोत—डॉ. शंकर दयाल शर्मा प्रकृति ने मनुष्य को बुद्धि-स्तर तक विकसित किया है। इस बुद्धि के कारण मनुष्य कुछ कर्म करने के लिए स्वतंत्र है। इस प्रकार कर्म करना मनुष्य का प्रकृति प्रदात्त अधिकार है। ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ में इस कर्म को व्यापकता प्रदान की गई है। प्रत्येक मानवीय कर्म के ‘योग’ अर्थात् ब्रह्म से युक्त होने का साधन बना देना ‘गीता’ का उद्देश्य है। प्राचीन काल में राजर्षियों ने कर्मयोग का पालन किया था। मनु, इक्ष्वाकु तथा जनक आदि राजा होते हुए भी ऋषि थे, और ऋषि होते हुए भी राजा थे। यही चेतना का वह स्तर है जहाँ गीता व्यक्ति को पहुँचाती है। आज विश्व में जो आपाधापी मची हुई है, विश्व के सामने जो अस्तित्व का संकट खड़ा है, यदि व्यक्ति की चेतना ‘निज’ से उठकर ‘पर’ की ओर जा सके तो उससे अनेक समस्याओं का समाधान हो सकता है। —इसी पुस्तक से
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