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एक महापुरु के विचार हैं—आचरण के मामले में तो आप स्वार्थी बन जाएँ तो मुझे कोई ऐतराज न होगा। अपना सुधार चाहो, अपने दोषों को दूर करने का प्रयत्न करो। स्वयं को सुसंस्कृत करो। अपने आप को शुभ चरित्र, सात्त्विक एवं उच्च विचार वाला बनाओ। इसके लिए पूरी शक्ति लगाकर जुट जाओ, दूसरे की ओर बिलकुल मत देखो। ईश्वर भी इस स्वार्थ की पूर्ति में तुम्हारा साथ देगा। वह तुम्हारे भीतर ही तो विराजमान है। तुम उसके शरीर रूपी पावन मंदिर को दोषों से स्वच्छ करके गुणयुक्त, पवित्र बनाओगे तो परमात्मा तो प्रसन्न होगा ही। तुम्हारा कर्तव्य स्वयं को सच्चरित्र बनाना है। सारा समाज और राष्ट्र तो फिर स्वयं ही सुधर जाएगा। इन सारी बातों को जान लें और मान लें तो ज्ञानी तो हो ही जाएँगे। इसीलिए तो पुस्तक को नाम दिया है—‘पढ़ै सौ ज्ञानी होय’। इस पुस्तक में मैंने अपनी ओर से शिक्षा देते हुए कुछ भी नहीं कहा है। कुछ सच्ची घटनाएँ, महापुरुषों के प्रेरक प्रंसग, नाटक, वार्त्ता, गीत, कविता आदि प्रस्तुत किए हैं। इसी रूप में पाठ्यक्रम के अंतर्गत सभी विषयों को समाहित किया गया है।
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Self Help;