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बिखरे तिनके’ उपन्यास का प्रारंभ जितने सौहार्दपूर्ण वातावरण में होता है, उसका अंत उतना ही त्रासद है। इसीलिए इसे ‘बिखरे तिनके’ नाम दिया गया है। हमारी आज की दुनिया और व्यक्ति में बिखरावहीबिखराव नजर आते हैं। से.रा. यात्री ने इस उपन्यास में हमारे समय के कई चेहरे उजागर किए हैं तथा बड़ी सावधानी से उनके चेहरे से मुखौटे उतार दिए हैं। इसमें औदात्य और प्रवंचना के भी कई स्तर व स्वरूप देखने को मिलते हैं। उपन्यास की भाषा सहज होने के साथसाथ पात्रों की औकात भी रेखांकित करती है। व्यंग्य और विद्रूप से भरे इस उपन्यास को लेखक ने कहीं भी अतिरिक्त नहीं होने दिया है। अपने समय को देखने का दर्पण है यह उपन्यास, जो सुधी पाठकों को रुचिकर लगेगा।.
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