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‘‘कहिए, मैं आपके लिए क्या कर सकती हूँ।’’ ‘‘क्या यह अब्बास का घर है।’’ ‘‘हाँ’’ ‘‘क्या वे घर पर हैं।’’ ‘‘नहीं, अभी वे ऑफिस गए हुए हैं। शाम को आएँगे।’’ ‘‘आप कौन?’’ ‘‘मैं उनकी पत्नी रुखसाना।’’ पीछे से एक बच्चा दौड़ता हुआ आया। यह सुनकर रेहाना का सिर चकरा गया। वह वहीं बैठ गई। रुखसाना ने बात आगे बढ़ाई—‘‘आप कौन।’’ बड़ी मुश्किल से उसके मुझेहाँह से यह शब्द निकला—‘‘रेहाना’’ पर शायद रुखसाना को रेहाना और अब्बास के विषय में पता था। उसने उसे अंदर आने के लिए कहा। ‘‘आइए।’’ और अपना सामान एक कमरे में रख दिया। उसके लिए चायनाश्ता लगाकर वह दूसरे कमरे में चली गई। दिन भर दोनों औरतों में कुछ भी वार्त्तालाप नहीं हुआ। शाम को अब्बास आया तो रेहाना को देखकर चौंक पड़ा। —इसी संग्रह से कहानियाँ किसी भी समाज जीवन का आईना होती हैं। प्रस्तुत संग्रह की कहानियाँ समाज में व्याप्त विसंगतियों, विडंबनाओं और आपसी द्वंद्व की बानगी पेश करती है। मनोरंजकता से भरपूर पठनीय कहानियाँ।.
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