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प्रस्तुत पुस्तक बिहार के अपेक्षाकृत पिछड़ेपन के कारणों को जानने के लेखक की अनुसंधानात्मक चेष्टा का परिणाम है। आखिर अकूत भौतिक संपदा तथा गौरवपूर्ण सांस्कृतिक विरासत वाले इस प्रदेश की दशा इतनी br>चुनौतीपूर्ण क्यों रही है? और इन संदर्भों में नेतृत्व परिणाम के अध्ययन हेतु डॉ. श्रीकृष्ण सिंह, जो लगभग 17 वर्षों तक बिहार के प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री पद पर कायम रहे, स्वाभाविक चुनाव के रूप में उभरते हैं। यह सत्य है कि डॉ. सिंह बिहार को अत्यंत कठिन समय में राजनीतिक-प्रशासनिक नेतृत्व देने में सफल रहे; परंतु उनकी कुछ प्रगतिशील नीतियों की (विशेषतः जमींदारी उन्मूलन!) तार्किक परिणति नहीं हो पाई और वे आधे-अधूरे ही रहे। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के अवदान को रेखांकित करती बिहार के विकास-क्रम की बानगी देती पुस्तक।.
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