Krishna

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₹ 229 ₹250
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  • ISBN: 9788185826851
  • Author(s): Yugeshwar
  • Publisher: Prabhat Prakashan (General)
  • Product ID: 572257
  • Country of Origin: India
  • Availability: Sold Out
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About Product

इन खुले केशों को देखो । मेरे ये केश दुःशासन के रक्‍त की प्रतीक्षा में खुले हैं । दुःशासन के रक्‍त से इनका श्रृंगार संभव है । मेरे पति भीम की ओर देखो । वे दुःशासन का रक्‍त पीने के लिए अपनी जिह्वा को आश्‍वासन देते आ रहे हैं । दुःशासन के तप्‍त रक्‍त से ही वे मेरे खुले केशों को बाँधेंगे । '' मेरी केश नागिन दुःशासन का रक्‍त पीना चाहती है । मैं प्रतिहिंसा की अग्नि में तेरह वर्षों तक जलती रही हूँ । प्रतिहिंसा के कारण ही जीवन धारण किए हूँ; वरना जिस दिन सभा में दुःशासन ने मेरे केश खींचे थे, मैं उसी दिन प्राणों का विसर्जन कर देती । मैं जानती थी कि जिसके पाँच वीर पति हैं, श्रीकृष्ण जैसे सखा हैं, उसे आत्महत्या का पाप करने की आवश्यकता नहीं । आज तुम्हें और महाराज युधिष्‍ठ‌िर को दुर्योधन से समझौता करते देख मुझे निराशा होती है । क्या इसी समझौते के लिए मैं वन-वन भटकती रही? नीच कीचक का पद-प्रहार सहा? रानी सुदेष्णा की दासी बनी? तुम लोगों का यह समझौता प्रस्ताव मेरी उपेक्षा है, मेरे साथ अन्याय है, नारी जाति के प्रति अपमान की स्वीकृति है । अन्यायी कौरवों से समझौता कर तुम अन्याय को मान्यता दोगे, धर्म का नाश और आसुरी शक्‍त‌ि की वृद्धि करोगे, साधुता को निराश और पीड़ित करोगे । राजा युधिष्‍ठ‌िर राजा हैं, वे अपनी सहनशीलता रखें, मैं कुछ नहीं कहती; किंतु तुम तो धर्म- विरोधियों के नाश के लिए ही पृथ्वी पर आए हो । क्या तुम अपने आगमन को भुला देना चाहते हो? पाँच या पचास गाँव लेकर तुम और राजा युधिष्‍ठ‌िर संतुष्‍ट हो सकते हैं, किंतु काल-नागिन जैसे मेरे इन केशों को संतोष नहीं हो सकता । मुझे इतना दुःख कभी नहीं हुआ था जितना आज तुम्हारे इस'' -इसी उपन्यास से

Tags: Fiction;

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