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हम जैसे हैं, उससे श्रेयस्कर बन सकते हैं । श्रेयस्कर होने का अर्थ है मानव के उन उदात्त गुणों का सर्वतोमुखी विकास, जो उसे अंतत: दिव्यता की ओर ले जाता है । दिव्यता के समस्त गुण मनुष्य के भीतर ही निहित हैं । आवश्यकता होती है उन्हें चैतन्य करने की । इसलिए इस जगत् के साथ ही मनुष्य को अपने बारे में भी जानना चाहिए । आत्मज्ञान बेहतर इनसान बनने का प्रथम सूत्र है । ' अध्यात्म और मनोविज्ञान दोनों मानते हैं कि जिस व्यक्ति का मन निर्मल है और जो मनोयोग से अपने दैनंदिन दायित्वों का निर्वाह करते हुए कठोर श्रम करता है, वह निर्विघ्न निद्रा का अधिकारी बनता है । दूसरों को सुख पहुँचाना और समस्त ब्रह्मांड के कल्याण की कामना करना मन की निर्मलता के सर्वश्रेष्ठ उपाय हैं । अच्छा बनने के लिए और अच्छा बनने में विश्वास की भूमिका संभवत: सर्वाधिक महत्वपूर्ण है । आस्था व्यक्ति को सतत आनंद देने के अलावा अनेक शारीरिक- मानसिक व्याधियों से भी उसकी रक्षा करती है । आस्था के इस बोनस को प्राप्त करने के लिए कोई सांसारिक व्यक्ति भी लालायित होगा । तो क्यों न अच्छा बनने की सुखकारी यात्रा आस्था के रास्ते पर कदम बढ़ाकर शुरू की जाए । इस दृष्टि से सुप्रसिद्ध भाषाविद् और विचारक डॉ. रमेश चंद महरोत्रा की यह पुस्तक निस्संदेह प्रेरक होगी ।.
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Fiction;