About Product
डॉ.उमेश प्रसाद सिंह के ललित निबंधों का यह तीसरा संग्रह है। ‘हवा कुछ कह रही है’ और ‘नदी सूखने की सदी में’ संग्रह के निबंधों का हिंदी जगत में व्यापक रूप में समादर हुआ है। अपने दौर में उमेश प्रसाद सिंह का लेखन निबंध की पारंपरिक विरासत को नए आयामों में विकसित करने के लिए जाना जाता है। इनके निबंध ललित निबंधों की प्रचलित रूपगत और ध्वनिगत अवधारणा को तोड़ते निबंध हैं। अर्थ-व्यंजना के नए रास्तों की तलाश का इनमें जोखिम भरा उत्साह है। इस पुस्तक के निबंध रचनाकार की विकास-यात्रा का अपनी रचनात्मक विशिष्टता में उद्घोष करते दिखाई पड़ते हैं। विषय की व्यापकता चिंतन के विस्तृत फलक का स्वयं प्रमाण प्रस्तुत करती है। इसमें मिथक, इतिहास और समकालीन जीवन-बोध अलग-अलग न होकर आपस में इस कदर संश्लिष्ट हैं कि एक सुदीर्घ अविच्छिन्न जीवन परंपरा के वाहक बन जाते हैं। इस संग्रह के निबंध संस्कृति-विमर्श के निबंध नहीं है, बल्कि संस्कृति की जीवंत सत्ता के अनुभव बोध के निबंध हैं। समकालीन राष्ट्रीय जन-जीवन की वेदना का गान इनमें साफ सुनाई पड़ता है। अपनी लयात्मक भाषा के कारण इस पुस्तक के निबंध अपनी अलग अस्मिता स्थापित करते हैं। मगर इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इन निबंधों की भाषा और अन्तर्वस्तु में एक सांगीतिक संगति है, जो पाठक के मन को पर्युत्सुक भी करती है और रसात्मक तोष भी देती है। इस संग्रह के निबंधों में आत्मीय आमंत्रण की गंध फूटती हुई महसूस होती है। इन निबंधों के केंद्र में मनुष्य की जीवन स्थितियाँ हैं। गहरी रागात्मक संवेदना है। सूक्ष्म विडंबना बोध है। प्रकृति के साथ आत्मिक संबंध है। राष्ट्रीय उत्थान की ललक है। जातीय जीवन का गौरव बोध है। अपने समय की सम्यक समझ है।.
Tags:
History;