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कहानीकार का संवेदन संस्कार के रूप में अपने परिवेश को ग्रहण करता है । वह उसी में जीता है, साँस लेता है । प्रवासी लेखक अपने घर-परिवार, देश और मिट्टी से अलग होकर एक अन्य देश-काल और परिवेश में चला जाता है । वहाँ उसके नए संस्कार बनते हैं, नए दृष्टिकोण बनते हैं । माहौल बदल जाने से उसकी जिंदगी में बहुत सी पेचीदगियों आ जाती हैं । उसकी मान्यताएँ बदलने लग जाती हैं । यहीं द्वंद्व के आरंभ का प्रारंभ होता है । और यहीं कहानियाँ जन्म लेती हैं । ये कहानियों भारतीय मूल्यों और मान्यताओं के चौखटे में br>संभवतः सही नहीं बैठेंगी; परंतु इन मूल्यों और मान्यताओं कै कारण ही एक परिवेश का साहित्य दूसरे परिवेश के साहित्य से अलग नहीं हो जाता । इन कहानियों के भीतर रिसी हुई गहरी मानवीय संवेदना उन्हें एक - दूसरे से जोड़े रखती है । सात समंदर पार होने पर भी यही मानवीयता इन कहानियों को समयातीत, कालेतर और समयसापेक्ष बनाती है ।
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Stories;