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‘‘मछली की खाद नीबू के पेड़ में डालने से फल अच्छे आते हैं न?’’ शिवा ने कहा, ‘‘सर, कलकत्ते में मछली का कुछ भी नहीं बचता, न चमड़ी, न हडड्ी और न मीट! खाद तो तब बनेगी, जब हडड्ी बचेगी! ओ हो! तभी कहते हैं इसे सोन मछरिया!’’ जलाशय के बदलते रंगों से शिवा को विशेष लगाव है। वही जलाशय, जो सुबह मासूम बच्चों-सा सोता है, दोपहर को धूप के आगे असहाय सा तिलमिलाता दिखता है और शाम को उसमें मानो सातों रंग भर जाते हैं। —इसी उपन्यास से.
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