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अश्विनीकुमार दुबे हिंदी व्यंग्य के एक चिर-परिचित हस्ताक्षर हैं। उनके पास व्यंग्य का मुहावरा एवं व्यंग्यकार की प्रखर दृष्टि है, जिसके प्रयोग द्वारा वे सार्थक व्यंग्य की रचना करते हैं। उनका दृष्टिकोण सकारात्मक है। उनकी व्यंग्यात्मक रचनाओं के विषय व्यापक हैं। वे सामयिक विषयों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी मात्र कर संतुष्ट नहीं होते, अपितु एक चिंतनशील रचनाकार के रूप में उसका विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। जहाँ एक ओर अधिकांश रचनाकार राजनीतिक विसंगतियों पर व्यंग्यात्मक टिप्पणी को रचना-कर्म मान रहे हैं, वहीं अश्विनीकुमार दुबे जैसे कुछ रचनाकार हैं, जो एक दृष्टि के साथ सामयिक विसंगतियों का विश्लेषण कर उनके दूरगामी प्रभावों की ओर लक्षित कर रहे हैं। उनकी चिंता वर्तमान की वे विसंगतियाँ हैं, जो मानव-जीवन के भविष्य को अपनी अँधेरी छाया से ग्रसित करना चाहती हैं। अश्विनीकुमार दुबे की व्यंग्य रचनाओं में कहानी जिंदा है। वे विद्रूपताओं को कथा के माध्यम से अभिव्यक्त करने में क रखते हैं। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में जहाँ एक ओर व्यंग्य अपनी अभिव्यक्ति के साथ रोचकता उत्पन्न करता है वहीं कथा भी उत्प्रेरक का काम करती है, और संभवतः इसी कारण उनकी व्यंग्य रचनाएँ व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के संकलन मात्र होने से बच पाई हैं। —प्रेम जनमेजय संपादक‘व्यंग्य यात्रा’.
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Novel;