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एक था आदमी—दिनकर जोशी मैं हक्का-बक्का रह गया। वह मछली ही थी। मछली के सिवा ऐसा कोई हँस ही नहीं सकता। थोड़ी ज्यादा लंबी हो गई थी। बदन हृष्ट-पुष्ट हो गया था। कुछ श्याम हो गई थी। घुटनों तक पहुँचने वाले बाल सूखे थे। ''मुझे पहचाना नहीं?’ ’ कहकर मछली फिर से हँसी। ''कल बड़े चाचा आए थे। तुम सब आए हो, ऐसी खबर दी। मुझे लगता ही था कि तुम आओगे।’ ’ ''बहुत साल बीत गए, नहीं?’ ’ मैंने कहा। बाद में आगे बताया, ''रामगर महाराज स्वर्ग सिधार गए, यह समाचार मुझे आज ही मिला।’ ’ मछली ने आसमान की ओर उँगली दिखाई, बाद में त्रिशूल के सामने देखकर बोली, ''पिताजी का त्रिशूल वैसी ही स्थिति में सँभालकर रखा है।’ ’ ''तब से...तब से...’ ’ मैं थोड़ा हिचकिचाया। उसे अब 'तू’ कैसे कह सकता हूँ? 'मछली’ कहकर भी संबोधन नहीं कर सकता। ''यहाँ कौन रहता है?’ ’ जवाब जानता था, उसके बावजूद सवाल पूछ बैठा। ''रक्षा करती हैं जगदंबा माता और आसपास की देखभाल में मेरा समय बीत जाता है।’ ’ —इसी संग्रह से भारतीय समाज में व्याप्त बुराइयों, विसंगतियों, पारिवारिक उलझनों, सामाजिक मान्यताओं एवं परंपराओं, उनके आदर्शों का यथार्थ चित्रण पेश करती भावपूर्ण व रोचक कहानियाँ।.
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