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यह खबर चारों तरफ आग की तरह फैल गई कि मैं देश-सेवा के लिए उतरनेवाला हूँ। जिसने सुना, भागा आया और मेरे निर्णय की दाद दी। बधाई-संदेशों का ताँता लग गया—‘सुना, आप देश-सेवा के लिए उतर रहे हैं। ईश्वर देश का भला करें!’ प्रस्ताव पर प्रस्ताव आने लगे कि बाइ द वे, शुरुआत कहाँ से कर रहे हैं? कौन सा एरिया चुन रहे हैं? हमारे अंचल से करिए न! बहुत स्कोप है। हेलीपैड बनकर विकसित होने लायक इफरात जमीन पड़ी है। आबो-हवा भी स्वास्थ्यप्रद है। ईश्वर की दया से गरीबी, भुखमरी और अशिक्षा आदि किसी बात की कमी नहीं। लोग भी सीधे-सादे, नादान किस्म के हैं—तो बहकने की कोई गुंजाइश नहीं। वर्षों सुख-शांति, अमन-चैन से गुजार सकेंगे आप ‘माई-बाप’, इन देश के लालों के साथ। ये हमेशा रोटी के लाले पडे़ रहने पर भी कभी शिकवे-शिकायत नहीं करते। हर हाल में मुझेहाँह सिलकर रहने की जबरदस्त टे्रनिंग मिली है इन्हें। मैंने सोचा, जगहें तो सारी एक सी हैं; ऐसे स्कोप कहाँ नहीं हैं! लेकिन जब कहा जा रहा है, ऑफर मिला है तो उन्हीं के एरिया से शुरुआत हो जाए। मेरा निश्चय सुनते ही प्रेसवाले दौडे़ आए और आग की तरह फैलती इस खबर में घी डाल गए।.
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